पारिवारिक मामलों में विश्वसनीय कानूनी सहायता

पारिवारिक और वैवाहिक विवाद जीवन के सबसे तनावपूर्ण क्षणों में से एक होते हैं। चाहे मामला आपसी सहमति से तलाक का हो, विवादित तलाक का, बच्चे की कस्टडी का, या घरेलू हिंसा का, आपको एक ऐसे वकील की आवश्यकता होती है जो आपकी बात को ध्यान से सुने और एक मजबूत, परिणाम-उन्मुख कानूनी रणनीति तैयार करे। साकेत पारिवारिक न्यायालय (Saket Family Court) और दिल्ली के अन्य जिला न्यायालयों में हमारे अनुभवी वकीलों की टीम ने सैकड़ों परिवारों को शांतिपूर्ण और कानूनी रूप से सुरक्षित समाधान प्राप्त करने में मदद की है। हम कानून के हर पहलू को स्पष्ट रूप से समझाकर आपको सशक्त बनाते हैं।

आपसी सहमति से तलाक (धारा 13बी)

जब पति-पत्नी दोनों आपसी समझ से शादी को समाप्त करने का निर्णय लेते हैं, तो यह सबसे त्वरित और गरिमापूर्ण तरीका है। इस प्रक्रिया में दो प्रस्ताव याचिकाओं (First & Second Motion) को अदालत में पेश किया जाता है। इनके बीच सामान्य रूप से 6 महीने का अंतराल होता है, जिसे विशेष परिस्थितियों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार माफ (Waiver) कराया जा सकता है। हम संपत्तियों के शांतिपूर्ण विभाजन, स्त्रीधन की वापसी और बच्चों की कस्टडी के समझौतों को कानूनी रूप से मजबूत बनाने में पूर्ण सहायता प्रदान करते हैं।

विवादित तलाक (Contested Divorce)

जब एक पक्ष तलाक चाहता है और दूसरा असहमत होता है, या जब गुजारा भत्ता और बच्चों की कस्टडी जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाती, तो कोर्ट के माध्यम से विवादित तलाक की याचिका दायर की जाती है। क्रूरता (Cruelty), परित्याग (Desertion), व्यभिचार (Adultery), या धर्म परिवर्तन जैसे कानूनी आधारों पर मुकदमा लड़ा जाता है। हमारी टीम आपके हितों, आपके बच्चों के अधिकारों और आपकी संपत्तियों की रक्षा के लिए आक्रामक और साक्ष्य-आधारित पैरवी करती है।

गुजारा भत्ता और बच्चे की कस्टडी

तलाक के दौरान बच्चों के भविष्य और आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24/25 के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही का संचालन किया जाता है। गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत बच्चों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए कस्टडी और मुलाक़ात के अधिकारों (Visitation Rights) के लिए न्यायालय के समक्ष प्रभावी दलीलें पेश की जाती हैं।

दिल्ली तलाक वकील

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आपसी सहमति से तलाक के लिए न्यूनतम अलगाव अवधि कितनी है?

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत, आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर करने से पहले पति-पत्नी को कम से कम एक (1) वर्ष की अवधि से अलग-अलग रहना अनिवार्य है।

विवादित तलाक में भरण-पोषण (Alimony) कैसे तय की जाती है?

अदालत पति और पत्नी दोनों की वित्तीय स्थिति, आय के स्रोत, जीवन स्तर, देनदारियों और पति-पत्नी की व्यक्तिगत आवश्यकताओं का विश्लेषण करने के बाद गुजारा भत्ता या भरण-पोषण की राशि तय करती है।

क्या भारत में आपसी सहमति से तलाक की 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि को माफ किया जा सकता है?

हाँ, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर) के अनुसार, यदि सुलह की कोई संभावना नहीं बची है और पक्षकार एक वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे हैं, तो अदालत विवेक का उपयोग करके 6 महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि (प्रतीक्षा अवधि) को माफ कर सकती है।

तलाक के मामले में बच्चे की कस्टडी (Child Custody) किसे मिलती है?

बच्चे की कस्टडी तय करते समय अदालत का प्राथमिक और एकमात्र विचार बच्चे का सर्वोच्च कल्याण (Welfare of the Child) होता है। सामान्य तौर पर, निविदा आयु (5 वर्ष से कम) के बच्चे की कस्टडी मां को दी जाती है, लेकिन पिता को मुलाक़ात का अधिकार (Visitation Rights) प्रदान किया जाता है।

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