अनुचित व्यापार प्रथाओं, त्रुटिपूर्ण उत्पादों और घटिया सेवाओं के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालयों में आपके अधिकारों की सशक्त सुरक्षा।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 ने भारतीय उपभोक्ताओं के अधिकारों को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की है। इसके तहत तीन स्तरीय अर्ध-न्यायिक प्रणाली का गठन किया गया है: जिला उपभोक्ता आयोग, राज्य उपभोक्ता आयोग, और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC)। यदि किसी बिल्डर ने आपके फ्लैट के पजेशन में देरी की है, बीमा कंपनी ने आपका जायज क्लेम खारिज कर दिया है, या किसी ई-कॉमर्स साइट ने आपको नकली सामान बेचा है, तो आपके पास एक बेहद प्रभावी कानूनी उपाय मौजूद है। हमारी टीम दिल्ली के सभी उपभोक्ता मंचों में ग्राहकों का कुशलता से प्रतिनिधित्व करती है।
दिल्ली-एनसीआर में बिल्डरों द्वारा फ्लैट के कब्जे में अत्यधिक देरी, घटिया निर्माण गुणवत्ता, बुकिंग समझौते के बाद छिपे हुए शुल्क (Hidden Charges) मांगना, और एग्रीमेंट के विपरीत बदलाव करना आम समस्याएं हैं। हम बिल्डरों के खिलाफ उपभोक्ता अदालतों में मुकदमे दायर कर ब्याज सहित राशि की वापसी, मानसिक तनाव का हर्जाना और कानूनी खर्च की वसूली सुनिश्चित करते हैं।
बीमा कंपनियां अक्सर स्वास्थ्य, जीवन, या वाहन बीमा दावों को तकनीकी कमियों या 'पहले से मौजूद बीमारी' (Pre-existing disease) का हवाला देकर अनुचित रूप से खारिज कर देती हैं। हम ऐसी गैर-कानूनी अस्वीकृतियों को चुनौती देकर बीमा दावों का पूर्ण भुगतान ब्याज और क्षतिपूर्ति के साथ दिलाने में पूरी मदद करते हैं।
ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर गलत, नकली या क्षतिग्रस्त उत्पाद भेजना, पैसे वापस करने (Refund) से इनकार करना, या भ्रामक विज्ञापन देना आम हो चुका है। 2019 के नए अधिनियम के तहत, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और विक्रेता दोनों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हम ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ प्रभावी कानूनी कार्यवाही करते हैं।
चिकित्सा लापरवाही के मामले शारीरिक और भावनात्मक रूप से अत्यंत दर्दनाक होते हैं। गलत निदान, गलत सर्जरी, बिना सहमति के उपचार करना, या ऑपरेशन के बाद की लापरवाही के मामलों में हम अस्पतालों और डॉक्टरों के खिलाफ स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता से एक ठोस साक्ष्य-आधारित मामला तैयार करते हैं।
₹50 लाख तक के दावे जिला आयोग में, ₹50 लाख से ₹2 करोड़ तक राज्य आयोग में, और ₹2 करोड़ से अधिक के दावे सीधे राष्ट्रीय आयोग (NCDRC) में दायर होते हैं।
हम सेवा में कमी या अनुचित व्यापार व्यवहार का विवरण देते हुए एक व्यापक शिकायत पत्र तैयार करते हैं, जिसके साथ बिल, रसीदें और पत्राचार संलग्न किए जाते हैं।
शिकायत दर्ज होने के बाद फोरम विपक्षी पक्ष (कंपनी/बिल्डर) को नोटिस जारी करता है, जिसका जवाब उन्हें अनिवार्य रूप से 30 से 45 दिनों के भीतर देना होता है।
दोनों पक्षों के साक्ष्य और बहस सुनने के बाद फोरम अंतिम आदेश पारित करता है, जिसमें रिफंड, मुआवजा, जुर्माना और अदालती खर्च शामिल होते हैं।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत मामलों का निपटारा 90 से 150 दिनों के भीतर करने का प्रावधान है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से मंच के कार्यभार और साक्ष्यों की जटिलता के आधार पर इसमें 1 से 2 साल का समय लग सकता है। हम मामलों के त्वरित निपटारे के लिए सक्रिय पैरवी करते हैं।
आप भुगतान की गई राशि की वापसी (Refund), त्रुटिपूर्ण उत्पाद का प्रतिस्थापन (Replacement), मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के लिए हर्जाना, कानूनी खर्च की वसूली और कुछ मामलों में सेवा प्रदाता की जानबूझकर की गई लापरवाही के लिए दंडात्मक हर्जाने की मांग कर सकते हैं।
हाँ, यदि सरकारी विभाग द्वारा शुल्क लेकर कोई सेवा प्रदान की जा रही है (जैसे डाक विभाग, रेलवे, बिजली बोर्ड या सरकारी बैंक), तो वे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में आते हैं। निःशुल्क सरकारी चिकित्सा या समाज कल्याण सेवाएं आम तौर पर इसके दायरे से बाहर हैं।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत, शिकायत वाद उत्पन्न होने (Cause of Action arose) की तिथि से दो (2) वर्ष के भीतर दर्ज की जानी अनिवार्य है। पर्याप्त और उचित कारण दर्शाने पर फोरम देरी को माफ कर सकता है।