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आपसी सहमति से तलाक (HMA Section 13B) तब होता है जब दोनों पति-पत्नी मिलकर शादी को समाप्त करने का निर्णय लेते हैं। इसमें दो याचिकाएं (First Motion और Second Motion) दायर की जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि दोनों पक्ष 1 वर्ष से अधिक समय से अलग रह रहे हैं, तो अदालत 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि (cooling-off period) को माफ (waive-off) कर सकती है। साकेत पारिवारिक न्यायालय (Saket Family Court) में हमारे विशेषज्ञ वकील इसे न्यूनतम समय में सुचारू रूप से पूरा करवाते हैं।
विवादित तलाक में अदालत दोनों पक्षों की आय, वित्तीय स्थिति, जिम्मेदारियों (जैसे आश्रित माता-पिता), जीवन स्तर और संपत्तियों का विश्लेषण करती है। धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण (temporary maintenance) और धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता (permanent alimony) तय किया जाता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 'रजनीश बनाम नेहा' फैसले के अनुसार दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और आय का विस्तृत हलफनामा दाखिल करना अनिवार्य होता है।
बच्चे की कस्टडी तय करते समय अदालत का प्राथमिक और एकमात्र विचार "बच्चे का कल्याण" (Welfare of the Child) होता है। सामान्यतः 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की कस्टडी मां को दी जाती है। हालांकि, पिता को बच्चे से मिलने का कानूनी अधिकार (Visitation Rights) प्रदान किया जाता है ताकि दोनों माता-पिता का बच्चे के जीवन में योगदान बना रहे।
कोर्ट मैरिज विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act) के तहत की जाती है। आवश्यक दस्तावेज निम्नलिखित हैं:
  • आयु का प्रमाण: लड़के की आयु 21 वर्ष और लड़की की आयु 18 वर्ष होनी चाहिए (आधार कार्ड, 10वीं की मार्कशीट)।
  • निवास प्रमाण पत्र: वोटर आईडी, पासपोर्ट, बिजली का बिल आदि।
  • तस्वीरें: दोनों पक्षों की 4-4 हालिया पासपोर्ट साइज तस्वीरें।
  • गवाह: पहचान पत्र और पते के प्रमाण के साथ 3 गवाह।
हमारे माध्यम से आप पूरी प्रक्रिया को बिना किसी परेशानी के करवा सकते हैं।
विशेष विवाह अधिनियम की धारा 5 के तहत पहले आपत्तियों को आमंत्रित करने के लिए पक्षों के आवासीय पते पर नोटिस भेजा जाता था। लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) के ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, पक्षों की गोपनीयता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, माता-पिता के घर नोटिस भेजना या इसे सार्वजनिक करना अब अनिवार्य नहीं है, जो जोड़ों की सुरक्षा के लिए एक बड़ी राहत है।
जब किसी व्यक्ति को यह आशंका होती है कि उन्हें किसी झूठे या गंभीर गैर-जमानती मामले (जैसे दहेज उत्पीड़न 498A, वित्तीय धोखाधड़ी आदि) में गिरफ्तार किया जा सकता है, तो वे गिरफ्तारी से सुरक्षा के लिए सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय में धारा 438 CrPC (अब BNSS के तहत) के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिका दायर कर सकते हैं। इसके स्वीकृत होने पर पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती।
यदि आपके खिलाफ कोई झूठी प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है या पक्षों के बीच आपसी समझौता हो गया है, तो आप धारा 482 CrPC (अब BNSS के तहत) के तहत दिल्ली उच्च न्यायालय में एफआईआर रद्द करने (FIR Quashing) की याचिका दायर कर सकते हैं। उच्च न्यायालय तथ्यों और साक्ष्यों को देखने के बाद पूरे मामले को खारिज कर सकता है।
पैतृक संपत्ति में अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए आपको सक्षम दीवानी न्यायालय (Civil Court) में बटवारे का मुकदमा (Partition Suit) दायर करना होता है। इसमें संपत्ति के मूल्यांकन के आधार पर अदालती शुल्क (Court Fee) तय किया जाता है। मामला दर्ज होने पर अदालत सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को समन जारी करती है और संपत्ति का भौतिक बटवारा या उसकी बिक्री से प्राप्त राशि के वितरण का आदेश देती है।
केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पदोन्नति (promotion), निलंबन (suspension), स्थानांतरण (transfer), या pension संबंधी विवादों के समाधान के लिए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), प्रिंसिपल बेंच (नई दिल्ली) में प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम की धारा 19 के तहत मूल आवेदन (Original Application) दायर किया जाता है। इसमें याचिका दायर करने से पहले विभागीय अपीलों (departmental remedies) का पूरा होना आवश्यक होता है।

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